कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: मोहिनी रानी 'मधुमयी'
अक्सर भूख को देखा है
फुटपाथ पर, रेलवे स्टेशन पर
गली-मोहल्लों में झोली फैलाये
बेबस निरीह लाचार सा
अक्सर भूख को देखा है
बन्द सांकलों के पीछे बिस्तर पर,
भीड़ में, अकेले में, सूनसान जगहों पर
गिध्दों सा नोचते हुए
हैवानियत सा
अक्सर सोचती हूँ
भूख रोटी के चूल्हे की आग है
या जंगल की आग
और समझ नहीं पाती अक्सर !
नवपल्लव बुक्स की वेबसाईट के लिए कवयित्री द्वारा चयनित कविता, मधुमयी, पृष्ठ-103
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