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कुछ कविताएँ

✍️ लेखन: मोहिनी रानी 'मधुमयी'

कुछ कविताएँ भस्म हो गईं

भूख के मरुस्थलों में

न उनसे मन की प्यास बुझी

न ही पेट की आग

 

और कुछ कविताएँ

बन गयी मानवता की राख सी

धरा पर गिरीं तो मिट्टी हो गईं

हवा में बहीं तो

आँख की किरकिरी बन गईं

 

धधक उठीं कुछ कविताएँ

दुर्भाग्यवश साम्प्रदायिक दंगों में

रक्त से लथपथ अतीत के रूप में

क़ैद हैं आज भी इतिहास की किताबों में।

 

 

नवपल्लव बुक्स की वेबसाईट के लिए कवयित्री द्वारा चयनित कवितामधुमयी, पृष्ठ-122

 


और कविताएँ

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