कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: मोहिनी रानी 'मधुमयी'
औरतें...
जो खटती रहीं घर में तमाम उम्र
कोल्हू के बैल सी
जिन्होंने अपने जिस्म के तेल और पसीने की
अंतिम बूँद तक स्वाहा कर दी
दूसरों की खुशी के लिए
और खुद हो गईं कंकाल सी
जो पिसती रहीं चक्की में पड़े गेहूँ सी
और ज़ायकेदार रोटी सी
परोसती रहीं खुद को
जिन्होंने भूख शांत की दूसरों की
तो उनके लिए तारीफ़ के क़सीदे पढ़े गए
और अगर कभी बेमन, बेजान सी बिछीं तो
सरका दी गयी बेमज़ा खाने से सजी थाली सी
क्योंकि....
भूख के लिए रोटी की कमी नहीं बाज़ार में
कमी तो हो गयी थी देह में मिले नमक की
और ज़बान में मिश्री के ज़ायके की
सो अपने अक्खड़पन की कीमत चुकाती
ये औरतें फेंक दी गईं घर के कोने में कबाड़ सी।
नवपल्लव बुक्स की वेबसाईट के लिए कवयित्री द्वारा चयनित कविता, मधुमयी, पृष्ठ-83
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