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बनफूल सी लड़की

बनफूल सी लड़की

✍️ लेखन: मोहिनी रानी 'मधुमयी'

बनफूल सी लड़की

 

वो फूल बेचती है..

पर उसे जीवन में कभी किसी ने फूल नहीं दिए

उसे नहीं पता था मन कैसे गुदगुदाता है

जब कोई मोगरे का गजरा वेणी में लगा दे

नहीं जाना उसने उस क्षण का परम सुख

जब कोई कानों के पास गुलाब खोंस कर

माथा चूम ले और कानों में हौले से कह दे

‘सुनो! तुम दुनिया की सबसे खूबसूरत स्त्री हो’...

 

उसकी सुहागरात का कमरा

फूलों की खुशबू से नहीं महका था

वो कभी कॉलेज नहीं गयी

सो उसके पास नहीं कोई ऐसी किताब

जिसमें दबे सूखे फूल में कैद होती

उसकी मोहब्बत की दास्तान

 

उसकी दास्तान तो शुरू हुई फूल तोड़ते-बीनते

बस मंदिर के पास फूल-माला बेचते

और कली सी ब्याह दी गयी खिलने से पहले

उसकी सुहागरात की चारपाई भी महकी

मगर शराब और ताड़ी की गंध से

लिखी गयीं उसके शरीर के अंगों पर

हर रोज़ अदृश्य पांडुलिपियाँ

जिन्हें समाज के बुद्धिजीवी कभी नहीं पढ़ सके

बिखरे बालों को समेट कस लीं उसने

जूड़े में ज़िम्मेदारियाँ.... क्योंकि

प्रकृति ने उसे एहसास दिलाया उसके ‘स्त्री होने की सम्पूर्णता’ का

 

सोलह की उम्र में गोद में बच्चा संभाले

उसे नहीं पता था कि ज़िन्दगी किस ओर ले जाएगी

मगर पता लग गया था कि

माँ बनने के बाद एक लड़की

सोलह की उम्र में ही औरत बन जाती है

 

उसने जान लिया था कि

भूख का नशा इतना तगड़ा होता है कि

फूलों की मादकता उसके आगे फीकी पड़ जाती है

उसने पढ़ लिए

तमाशबीन क़िस्मत की किताब के वे सारे पन्ने

जिसमें कैद थे उसकी पीड़ा के तमाम किस्से

मगर जिनमें खुशबुओं का नामोनिशान तक न था

 

नहीं आता था उसे पढ़ना-लिखना

नौकरी करना....बड़े-बड़े भाषण देना

उसे पता था बस फूल बेचना

सो वो बस फूल बेचती है

तमाम गिद्ध दृष्टियों को काया में कोंचती

कुम्हलाए फूल सी हो चली है

वो एक बनफूल सी लड़की।

 

 

 

 

नवपल्लव बुक्स की वेबसाईट के लिए कवयित्री द्वारा चयनित कविता, मधुमयी, पृष्ठ-15


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