कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: प्रशांत सागर
जुगाड़ वाला मुल्क़
जब हमें कोसों चलते मज़दूरों
के पैरों में उठे
दर्द को ज़िंदा रखने के लिए छाती पीटनी थी
तो हमने थालियाँ पीटी
जब हमें थोक में जलती चिताओं से
जलानी थी सीने में आग
तो हमने
मोमबत्तियों में आग लगाकर काम चला लिया
हम सच में जुगाड़ वाला मुल्क़ थे।
स्त्रोत : फफूंद । उपलब्धता : नवपल्लव बुक्स । प्रकाशन : पंक्ति । संस्करण : प्रथम । कीमत : 249
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