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लड़कियाँ

✍️ लेखन: मोहिनी रानी 'मधुमयी'

कुछ लड़कियाँ होती हैं बादल सी

वक़्त-बेवक़्त बरस जाती हैं

उनके बरसने के लिए इंतज़ार नहीं

करना पड़ता बरसात का

राह नहीं देखनी होती सावन-भादों की

काफी होता है उन्हें प्यार से गले लगा लेना

और उनकी भावनाएँ उमड़ उठती हैं ज्वार-भाटा सी

 

कुछ लड़कियाँ होती हैं बेगम अख्तर की ग़ज़लों सी

जो मोहब्बत के अंजामको अक्सर स्वीकार नहीं कर पातीं

मचल उठती हैं ज़िद्दी बच्चे सी गुनगुनाते हुए

आज जाने की ज़िद न करो और बिखर जाती हैं

फरीदा खानम की ठुमरी सी

 

लड़कियाँ... जिनकी मुस्कान पारिजात सी होती है

आत्मसम्मान के नारंगी रंग से प्रदीप्त

जिनकी आभा सिंदूरी हो उठती है प्रेम की आहट से

जो हुनर रखती हैं प्रेम में मन जीत लेने का

जो पढ़ लेती हैं मौन के पन्नों पर लिखे

अदृश्य प्रेम-संदेश

जिनकी वाचालता शब्द दे देती है

चुप्पी साधने वाले लड़कों की प्रेम कहानियों को

जो सजा लेती हैं... प्रेम को माथे पर कुमकुम-सा

जिनकी लाली, काजल, पाजेब, झुमके में

जीवन मुस्कराता है और मृत्यु मलान्मुखी हो

मुँह छिपा बैठती है दूर किसी खोह में

जो डरती हैं प्रेम में बिछड़ जाने से

पर नहीं डरतीं सीमा के परे जाकर प्रेम करने से

 

जो जूझती हैं.... अन्तर्द्वन्द की पीड़ा से

रोती-बिलखती... बेसुध हो जाती हैं दुःख के आधिक्य से

पर दूसरे ही क्षण जब खिलखिलाती हैं तो

गुलमोहर खिल उठते हैं भरी दोपहर में भी

जो जकड़ी हैं भाग्य की निर्मम जंज़ीरों से

पर बेड़ियाँ तोड़ अनंत की राह पर चलने का

अदम्य साहस रखती हैं

 

लड़कियाँ... जो दुःख से पत्थर नहीं बनतीं

बल्कि नदी हो जाती हैं

कौन जानता है कि समन्दर का खारापन

इन नदी जैसी लड़कियों के आँसुओं की देन है

 लड़कियाँ... जो भाग्य से छले जाने पर टूटती नहीं

और मजबूत हो जाती हैं

इतनी मजबूत...कि जीवन विवश हो जाता है स्वयं जीने को

 

लड़कियाँ... जो सब कुछ खोकर भी खाली नहीं होतीं

भर लेती हैं अपने भीतर उदासी, दुःख, खोने की पीड़ा

जिनके बोझ से दम तोड़ने लगती हैं उनकी मुस्कान

उनके सपनों का बोझ उठाती पलकें थकने लगती हैं

कदम लड़खड़ाने लगते हैं

पारिजात मुरझाने लगते हैं, सूरज रक्तिम हो उठता है

और चंद्रिका श्यामल हो उठती है

 

पर नहीं... तुम्हें हार नहीं माननी है

जीवन से, भाग्य से और समय से

तुमने हार मानी तो नदी बहना भूल जाएगी

समन्दर सूख जाएँगे

पारिजात की मादकता नष्ट हो जाएगी

गुलमोहर जेठ की दोपहर में खिलने से भय खाएँगे

तुम्हारे मन की पीड़ा तुम्हें पत्थर नहीं बना सकती

क्योंकि ईश्वर के स्पर्श की प्रतीक्षा में शिला बनकर

युग बिताने से बेहतर है...जीवन धारण कर

प्रतिकूलता में अनुकूलता का समावेश कर कर्तव्य-निर्वहन करना

प्रकृति की रम्यता, संसार की जीवंतता तुम से ही है

और तुम्हें इसे बचाकर रखना है

लड़कियों ! तुम्हें हर हाल में जीना है

जीवन में प्राण भरकर.. मुस्कराते हुए जीना है।


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