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मैं सरल हिन्दी सी

✍️ लेखन: मोहिनी रानी 'मधुमयी'

मैं श्रृंगार रस में आकंठ निमग्न

प्रीत के छेदों की स्वर-लहरी में डूबी

अलंकारों से सुशोभित

प्रत्येक रात्रि तुम तक आयी हूँ

सीधी, सरल, प्रेममयी हिंदी सी

किन्तु तुम कभी भी अपने प्रिय विषय

भूगोल से ऊपर उठ न सके

 

अपने साधारण होने के दोष में घुलती

मैं उपेक्षिता सी हो गयी अपनी ही दृष्टि में

और तुम पहाड़ और पठारों की तुलना करते

सर्वज्ञ हो गए मानचित्रों के निर्धारण में

 

मैं संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण को

विस्मृत कर होती जा रही संज्ञाशून्य सी

पर देख रही हूँ गणित में तुम्हारी दक्षता

क्योंकि नाप-तोल का काम

तुम आजकल आँखों से ही करने लगे हो

 

मेरा अस्तित्व गल-गलकर विलीन हो रहा है

इतिहास के किन्हीं भग्नावशेषों में

और तुम सम-सामयिक विषयों पर

अपनी पकड़ मजबूत बना रहे हो

पर सुनो... शायद हिंदी से भूगोल की

राह तय करती मैं टटोल रही हूँ

अपना बिखरा हुआ अस्तित्व

और तुम भूगोल के विभिन्न उपविषयों में

जिज्ञासा रखते प्रतिक्षण मुझे खोते जा रहे हो

 

सूखती झीलों सी मैं समाप्त होकर

एक दिन बन जाऊँगी प्रेम-काव्यों की आत्मा

और तुम्हारे हिस्से आएगा केवल

देह का वैश्विक तापमान (Global warming)

सूखती भावनाएँ

कठोरता के पिघलते ग्लेशियर

 

तुम पाइथागोरस के प्रमेय में उलझे

रहना आजीवन.. और.. मैं ..

तुम्हारे भूतकाल के अनगढ़ अवशेषों में

ढलकर हो जाऊँगी विलीन

किसी नदी घाटी सभ्यता सी...।

 

नवपल्लव बुक्स की वेबसाईट के लिए कवयित्री द्वारा चयनित कवितामधुमयी, पृष्ठ-84

 


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