कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: मोहिनी रानी 'मधुमयी'
निश्चित ही प्रेम सहेजा जाना चाहिए
शरीर से होकर.. आत्मा के पृष्ठों में
हृदय के स्पंदन में... अधरों के मौन में
और.. नयनों की भाषा में..
स्पर्श की मृदुता को श्वासों की लय के संग
ढलती प्रेममयी कठोरता में
जो अछूते हैं प्रेम से उन्हें निश्चित ही
खोना चाहिए किसी मृगनयनी के
चंचल नेत्रों की मधुशाला में
और निमग्न होना चाहिए किसी तरुणी को
किसी समुद्र से गम्भीर प्रेमी की
भावनाओं के ज्वार में
शब्दों की परिधि से ऊपर उठे भाव
जब तरंगों की भाँति दूरी तय करते हैं
प्रेमी के मन से प्रेमिका के मन तक
तब चंद्रकलाओं सा सौंदर्यबोध देता प्रेम
प्रेमी-युगलों के अंग-अंग से फूट पड़ता है
पलाश के फूलों की आभा सा
जिन्होंने कभी प्रेम नहीं किया
उन्हें पढ़नी चाहिए प्रेम में पड़े किसी प्रेमी द्वारा
यामिनी के प्रत्येक क्षण को साक्षी बना
तारों की छाँव में लिखी गयीं प्रेम कविताएँ
और उन प्रेम कविताओं को हृदय से लगाकर
शीतलता का अनुभव करती प्रेमिकाओं की
मधुर मुस्कान में जीना चाहिए
संसार की हर स्त्री को सृष्टि की सबसे सुंदर भावना
सहेज लेनी चाहिए मिलन की
सारी मधुर स्मृतियाँ
संभाल लेनी चाहिए वियोग के
सारे आँसुओं की धरोहर
शरीर पर अंकित प्रेमकथाओं की पांडुलिपियाँ
छुपा लेनी चाहिए मन के तहखाने में
क्योंकि आजीवन साँसों में लयबद्ध
प्रेम कभी विस्मृत नहीं होता।
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