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शिउली (हरसिंगार)

✍️ लेखन: मोहिनी रानी 'मधुमयी'

सुनो शिउली !

तुम हमेशा खिलना

तब भी... जब वेदना की तममयी रात्रि समाप्त ही न हो

तब भी... जब पतझड़ का साम्राज्य स्थायी हो

वसन्त की कोई आहट न हो

 

तुम तब भी खिलना

जब सूर्य के प्रचंड ताप से तुम्हारी काया मुरझा चले

शशिकला के स्पर्श को तुम्हारे नेत्र तृषित रह गए हों

शीत तुम्हें निर्बल कर दे

 

तुम मत मुरझाना

विषम परिस्थितियों की ऊष्मा में

पीड़ाओं के उदधि में अस्तित्व को विलीन मत करना

दुःख की अग्नि में तपकर निखर उठना स्वर्ण-से

 

तुम हमेशा खिलना

तब.. जब प्रेम को कहीं भी विकसते देखना

तुम झर जाना हौले से विरह के कारण

म्लानमुखी प्रेमिका के अंक में

तुम सज्जित हो जाना मिलन की रात्रि में प्रेमी की अंजलि में

कुमकुम सी प्रदीप्त हो जाना स्त्रीत्व का सौंदर्य बनकर

और सुशोभित होना

उन सब प्रेमिकाओं के ललाट पर सुहाग का प्रतीक बन

जो अपने प्रेमियों से मिल जाती हैं

तुम इठलाना गर्व से उनके सौभाग्य में

अपना स्वप्न पूर्ण होते देखकर

 

शिउली !

तुम हमेशा पवित्र प्रेम का प्रतीक बनकर रहना

उन प्रेमिकाओं के अधूरेपन में

जो भाग्य की प्रतिकूलता के वशीभूत हो

अपने प्रेमियों से मिल न सकीं

 

तुम हमेशा खिलना

मुस्काना और

झर जाना...

पर तुम मत भूलना

तुम ईश्वर के होने का प्रमाण हो

इस धरती पर तुम अमरत्व की छाँव हो

इसलिए तुम कभी मत मुरझाना

कभी मत मुरझाना..।


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