कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: डॉ. अमित धर्मसिंह
आपके बारे में अक्सर सोचता हूँ
सोचता हूँ, कितना बढ़कर सोचता हूँ
आप भी इतना तो शायद जानते हैं
आप पर मैं कुछ तो हटकर सोचता हूँ
सोचता हूँ कहने से पहले बहुत मैं
बाद में भी काफी कहकर सोचता हूँ
जिस जगह होती है ज़रूरत सोचने की
उस जगह तो रुककर जमकर सोचता हूँ
डर नहीं लगता है मुझको सोचने से
हौंसला मैं मन में रखकर सोचता हूँ
फ़ाँसला जो कर दे पैदा दरमियाँ में
सोच से ऐसी मैं बचकर सोचता हूँ
आप भी क्या मेरे हक़ में सोचते हैं
आपके हक़ में मैं दिनभर सोचता हूँ
Start typing and press Enter to search