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मौत की महफ़िल सजाते फिर रहे हो

✍️ लेखन: डॉ. अमित धर्मसिंह

मौत की महफ़िल सजाते फिर रहे हो

भीड़ में तुम बम लगाते फिर रहे हो

 

कर चुके सबकुछ हवाले आग के जब

आग से फिर क्या बचाते फिर रहे हो

 

निज हितों के वास्ते तुम हर किसी के

सामने सर को झुकाते फिर रहे हो

 

पेट जबसे भर गया बदलाव की तुम

बेवजह बातें बनाते फिर रहे हो

 

शॉल से क्या ऐब सारे ढक सकोगे

शॉल जो सबको उढ़ाते फिर रहे हो

 

जानते हैं सब हक़ीक़त आपकी जब

किसलिए ख़ुद को छुपाते फिर रहे हो

 

क्या इबारत लिख रहे हो, क्या ख़बर है?

क्या लिखे में क्या मिटाते फिर रहे हो


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