कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: डॉ. अमित धर्मसिंह
जिन आँखों में मृत सपनों का मलबा है
उन आंखों में जीवन बेहद धुँधला है
उनके दावे, उनके वादे, कसमें सब
इक से बढ़कर इक जनता से धोखा है
उन रस्तों की मंज़िल सोचो क्या होगी
जिन रस्तों पर बस ख़तरा ही ख़तरा है
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