कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: डॉ. अमित धर्मसिंह
कौन-सी है राह जिस पर जा रहे हो
सोच तो लो, खो रहे या पा रहे हो
बात इतनी-सी समझना है ज़रूरी
बात समझी क्या? जिसे समझा रहे हो
क्या कभी सुलझा सकोगे ज़िन्दगी को
ज़िन्दगी जो इस क़दर उलझा रहे हो
है शिखर वो कौन-सा जिसके लिए तुम
हर नज़र से रोज गिरते जा रहे हो
चैन से फिर साथ किसके रह सकोगे
जब सभी से दूर भागे जा रहे हो
Start typing and press Enter to search