कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: डॉ. अमित धर्मसिंह
बेवजह की बात को रहने दे
जात में क्या? जात को रहने दे
दिन निकलता है निकल जायेगा
कुछ घड़ी की रात को रहने दे
बात से भी काम बन ही जाते
मत चला तू लात को रहने दे
दे सके तो हक़ मिरा दे मुझको
और सब ख़ैरात को रहने दे
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