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इस सीने में जाने कितने राज़ दफ़न

✍️ लेखन: डॉ. अमित धर्मसिंह

इस सीने में जाने कितने राज़ दफ़न

बोल रहा हूँ पर मेरी आवाज़ दफ़न

 

तोता, मैना, बुलबुल, हारिल, गौरैया

शहरों में हैं इन सबकी परवाज़ दफ़न

 

बोलो किसको दूँ खुलकर मैं आज सदा

जीते-जी, जब सारे हम-आवाज़ दफ़न

 

बेशक! आगे आए हैं कुछ लोग यहाँ

पर इतिहासों में कितने आग़ाज़ दफ़न

 

कहने को तो हम सब कहते रोज ग़ज़ल

लेकिन मीरो ग़ालिब के अंदाज़ दफ़न

 

बरसों की ख़ामोशी पढ़कर देख कभी

इसके नीचे कितने हैं अल्फ़ाज़ दफ़न

 

दुनिया भर के किस्से पढ़कर देख लिए

सबमें कुछ ख़ामोशी के अल्फाज़ दफ़न

 

अपने पैरों जिस पर हम हैं आज खड़े

उस धरती में अनगिन हैं जाँबाज़ दफ़न


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