कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: डॉ. अमित धर्मसिंह
सोचते हैं आप जो, वैसा नहीं हूँ
मैं तुम्हारी भीड़ का हिस्सा नहीं हूँ
मैं हक़ीक़त हूँ सही में इस समय की
टूट जाऊँ मैं निरा सपना नहीं हूँ
बस ज़रा-सी है मिरी पहचान ये ही
मैं सभी का हूँ फ़क़त अपना नहीं हूँ
आप माने या न माने सच यही है
बेवजह कुछ मैं कभी लिखता नहीं हूँ
एक मंजिल हूँ किसी के वास्ते मैं
मैं सभी के वास्ते रस्ता नहीं हूँ
Start typing and press Enter to search