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सबका हाथ पकड़ना छोड़

✍️ लेखन: डॉ. अमित धर्मसिंह

सबका हाथ पकड़ना छोड़

ख़ुद से रोज बिछड़ना छोड़

 

बसकर एक जगह पर देख

हर दिन यार उजड़ना छोड़

 

जीना सीख सके तो सीख

बनकर लाश अकड़ना छोड़

 

ख़ुद के हाथ सँवरना सीख

सबके हाथ बिगड़ना छोड़

 

मुश्किल राह कटेगी यार

चलना सीख घिसड़ना छोड़

 

इक दिन मान बढ़ेगा खूब

बस तू नाक रगड़ना छोड़


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