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आ गए तुम रोशनी से भर गया मैं

✍️ लेखन: डॉ. अमित धर्मसिंह

आ गए तुम रोशनी से भर गया मैं

हँस दिए तुम ज़िंदगी से भर गया मैं

 

जिस घड़ी तुम खिलखिलाए कुछ लजाकर

उस घड़ी इक ताज़गी से भर गया मैं

 

उन निगाहों से हुई जो बात फिर से

इक पुरानी तिश्नगी से भर गया मैं

 

हूँ बड़ा काफ़िर मगर ये बात सच है

फिर तुम्हारी बंदगी से भर गया मैं


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