कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: डॉ. अमित धर्मसिंह
आपका मेरा भला क्या राब्ता है
आपसे मेरा अलग जब रास्ता है
उस बशर के सामने डमरू बजाना
जो इशारे पर तुम्हारे नाचता है
नापता है थान से जो कुछ अधिक ही
वो सदा ही नाप से कम काटता है
खोजने वो भी चला है आज मुझको
शख़्स ख़ुद ही जो कभी का लापता है
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