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हक़ीक़त से परे जब आदमी है

✍️ लेखन: डॉ. अमित धर्मसिंह

हक़ीक़त से परे जब आदमी है

ज़मीं पर आदमी फिर अजनबी है

 

नहीं जब ग़म हमारे एक साथी

रही फिर क्या हमारी दोस्ती है

 

मशीनों को बनाकर देखिए तो

बचा क्या आदमी में आदमी है

 

जिसे जीवित बशर को पूजना था

बुतों की कर रहा वो बंदगी है

 

दिखावे या भुलावे में उलझकर

तड़पती हर किसी की ज़िन्दगी है

 

दिखाई कुछ नहीं देता किसी को

हुई कैसी नई ये रोशनी है


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