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ना टिकेगा धूर्त तू जा भाग जा

✍️ लेखन: डॉ. अमित धर्मसिंह

ना टिकेगा धूर्त तू जा भाग जा

जा किसी के खोल में छुप जाँ बचा

 

किस पते को बेवजह तू ढूँढ़ता,

खो गया जब तुझसे तेरा ही पता

 

ये मलाई और मक्खन भूल जा

तू किसी के तलवे जाकर चाट जा

 

जिन जुगाड़ों से गुजरता जा रहा

उन जुगाड़ों की न मंज़िल, रास्ता

 

बात अपनी ख़ुद समझता तू नहीं

क्या बुरा मानूँ मैं तेरी बात का

 

दुम हिलाते फिर रहा है हर जगह

अब किसी घर का, न तू है घाट का

 

आइने को देखता तो रोज है

जा किसी दिन आइने को मुँह दिखा


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