कृपया प्रतीक्षा करें...

YOUR CART
Total: ₹0
मेन्यू

मूल में रद्दोबदल करने लगे

✍️ लेखन: डॉ. अमित धर्मसिंह

मूल में रद्दोबदल करने लगे

रच न पाए तो नकल करने लगे

 

बढ़ गई जब आपकी मनमानियाँ

हम किनारा दरअसल करने लगे

 

एक चूहे की तरह घुसपैठ तुम

हर विषय में आजकल करने लगे

 

चाहतों के तोड़कर पिंजरे सभी

ज़िन्दगी में अब शगल करने लगे

 

देश छूटा जा रहा है हाथ से

राज कैसा तुम विफल करने लगे


और ग़ज़ल

इस सीने में जाने कितने राज़ दफ़न
पढ़ें
जिन आँखों में मृत सपनों का मलबा है
पढ़ें
सोचते हैं आप जो, वैसा नहीं हूँ
पढ़ें
कौन-सी है राह जिस पर जा रहे हो
पढ़ें
बेवजह की बात को रहने दे
पढ़ें
मौत की महफ़िल सजाते फिर रहे हो
पढ़ें

Start typing and press Enter to search