कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: डॉ. अमित धर्मसिंह
एक दिन सूर्य उगेगा
अपने सम्पूर्ण तेज के साथ
भर देगा उजाला उन अँधेरे कोनों में भी
जो सदियों से पड़े हैं वीरान और भयावह,
उस दिन की रात
उतनी काली नहीं होगी
जितनी कि चली आ रही है आज तक
चाँद उस रात
सूर्य के प्रकाश को और अधिक सोख लेगा
और छिटका देगा धरती की हरेक चीज पर
चाँदनी में नहाई उस रात की हर एक चीज़
दमक उठेगी भरपूर
अपने सम्पूर्ण वजूद के साथ
तमाम स्याह आवरण छंट जाएँगे उस रात,
उस रात
चाँदनी में नहाए
और उजाले से भरे लोग
दिखाई देंगे एक-दूसरे में आर-पार
सन्निकट बैठकर बतियाएँगे,
ठहाके मारेंगे,
उस रात उनकी बात
नहीं चुभेगी एक-दूसरे को शूल की तरह
वाणी के सारे कटु शब्द
गायब हो चुके होंगे ज्ञान कोश से उस रात,
शेष बचे शब्दों में हर कोई
पूछेगा कुशल-क्षेम एक-दूसरे का
उस दिन ये पर्वत, ये नदियाँ,
ये पेड़-पौधे,
ये पशु-पक्षी सब बोल उठेंगे
अनंतकाल की चुप्पी तोड़कर बताएँगे
आदमी से उसका अतीत
और उसके सारे अपराध क्षमा करते हुए
देंगे आमंत्रण एक नई दुनिया के निर्माण का,
उस दिन सब एक-दूसरे को चूंटी काटकर जानेंगे
सपने और हकीकत का भेद,
छूकर देखेंगे एक-दूसरे को,
उस दिन एक-दूसरे के स्पर्श
मैला नहीं करेंगे एक-दूसरे को,
उस दिन महसूस करेंगे सभी
एक-दूसरे की संपूर्ण उपस्थिति
अपने सम्पूर्ण अनुभव के साथ,
उस रात आसमां के सब तारे
उतर आएंगे ज़मीन पर
और धरती का शृंगार करेंगे
घूमती हुई धरती
क्षण भर ठहरकर निहार उठेगी ख़ुद को,
हर एक सम्मिलित रहेगा
हर एक की खुशी में अपनी खुशी के साथ,
पीछे छूट चुके और पीछे जाने वाले भी
आ जायेंगे आगे और एक-दूसरे से गले मिलेंगे
फिर सभी
अपनी-अपनी जगह और पहचानें छोड़ते हुए
समा जायेंगे एक-दूसरे के दिल में,
एक दिन ऐसा होगा
ज़रूर होगा
हम उस एक दिन के लिए ही तो
चलते चले जा रहे हैं अनंतकाल से,
लिखते जा रहे हैं कविता पर कविता;
यह भी कि उस एक दिन के लिए भी
लिखी जाएगी एक कविता
आख़िरी कविता ।
स्त्रोत : नवपल्लव बुक्स के लिए कवि द्वारा चयनित और भेजी गई कविताओं में एक कविता
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