कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: डॉ. अमित धर्मसिंह
ऐसी कविता
जिसमें दरबार आता है गर्वीले रूप के साथ
या फिर छिप जाता है चोर की मानिंद
मेरी नज़र में वह कविता दरबारी कविता है,
ऐसी कविता
जिसमें दरबार की चालाकियाँ और क्रूरताएँ दर्ज नहीं होती
या जिसका विषय दरबार की हक़ीक़त से भटका देता है
मेरी नज़र में वह दरबारी कविता है,
ठीक इस समय
जबकि बहुत से लोग
भूख और बीमारी से जूझ रहे हैं
और जो कवि प्रेयसी या प्रकृति चित्रण में मग्न हैं
तो उनकी कविता की एक-एक पंक्ति
दरबारी कविता की पंक्ति है,
ऐसे कवि और आलोचक
जो मनुष्यता पर छाए संकट में भी
तथाकथित महान ग्रंथों की टीका-टिप्पणी में मशगूल हैं
मुझे उनके दरबारी कवि
या भांड होने में ज़रा भी संदेह नहीं,
ऐसी कविता
जो भूखे पेट भजन की सलाह देती है
रोटी और रोजगार का पाठ न पढ़ाकर
धर्म का पाठ पढ़ाती है
मरते हुए लोगों को सकारात्मकता की सीख देती है
जलती हुई चिताओं की अग्नि से
वातावरण के शुद्ध होने की कामना करती है
पाठक को यथार्थ की ज़मीन से उठाकर
आभासी संसार में समृद्ध और सुखी बनाती है
मेरी नजर में नितांत दरबारी कविता है,
मैं ऐसी कविता को
राजा के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष
स्तुतिगान से अधिक
कुछ नहीं मानता ।
स्त्रोत : नवपल्लव बुक्स के लिए कवि द्वारा चयनित और भेजी गई कविताओं में एक कविता
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