कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: डॉ. अमित धर्मसिंह
बरसों पहले सुना था
भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता,
यह उन दिनों की बात है
जब सीसीटीवी कैमरे नहीं होते थे
जब वीडियो नहीं बनाई जाती थी
जब भीड़ कानून से डरती थी
वह छूटते ही आक्रामक नहीं होती थी
वह किसी को मारने नहीं दौड़ती थी
घर से लाठी डंडे लेकर नहीं निकलती थी
उसके मुँह में गगनचुंबी नारे नहीं होते थे
उसमें किसी एक जाति या
धर्म के लोग नहीं होते थे,
मगर अब ऐसा नहीं
बरसों पहले सुना हुआ कथन
आज गलत साबित हो चुका है
भीड़ की अब एक जाति होती है,
एक धर्म होता है,
मरने वाले की भी एक जाति होती है,
एक धर्म होता है,
दोनों की पहचान की जा सकती है,
दोनों क़ैद होते हैं सीसीटीवी कैमरे में,
भीड़ खुद भी बनाती है
अपनी क्रूरता की वीडियो
क्योंकि वह अब डरती नहीं
न धर्म से,
न कानून से,
न संविधान से
लोकतंत्र की तो जरा भी परवाह नहीं उसे,
जिस किसी को
भीड़ का चेहरा दिखाई नहीं देता,
उसे अपनी आँखें टेस्ट करवानी चाहिए!
हो सकता है- उसे कलर ब्लाइंडनेस हो,
हो सकता है- वह सावन का अंधा हो,
हो सकता है- उसे एक खास रंग का ही दिखता हो,
हो सकता है- वह एक खास रंग को ही पहचानता हो,
हो सकता है- उसे दूसरे रंग नज़र ही न आते हों,
नजर आते हों तो पहचानता न हो
या पहचानना न चाहता हो,
ऐसे आदमी को अपनी आँखें जल्दी टेस्ट करवानी चाहिए,
आँखें ठीक निकले तो अक्ल की खैर-खबर लेनी चाहिए,
देखना चाहिए कि भीड़ का चेहरा है
बेहद वीभत्स,
क्रूर और घिनौना
उसके हाथ हैं, उनमें लाठी डंडे हैं,
उसके पाँव हैं,
वह कहीं से भी, कभी भी आ सकती है
वह हर जगह छुपी बैठी है घात लगाए,
उसका अब एक नारा है!
वह जिसके नाम का नारा लगाती है,
मरने वाला भी उसी के नाम को उल्टा करके
जान की दुहाई देता है
मगर भीड़ पर असर नहीं होता,
क्योंकि वह भीड़ नहीं
एक सेना है
किसी की भेजी हुई प्रशिक्षित सेना ।
स्त्रोत : नवपल्लव बुक्स के लिए कवि द्वारा चयनित और भेजी गई कविताओं में एक कविता
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