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जातीय अहम से भरा घड़ा

✍️ लेखन: डॉ. अमित धर्मसिंह

उसे प्यास लगी

और वह पहुँच गया घड़े के पास,

 

उस घड़े के पास

जिसमें पानी नहीं

जातीय अहम भरा था,

 

मगर वह तो बच्चा था

यह सब कहाँ जानता था

वह तो प्यास को प्यास

घड़े को घड़ा

पानी को पानी समझता था

और तो और

वह तो मास्टर को भी जानता मास्टर

सिर्फ मास्टर,

 

इसलिए बेखौफ पी गया घड़े से पानी,

पानी के साथ

अनजाने में ही पी गया

घड़े में भरे जातीय अहम को भी,

 

दो घूट पानी या कहिए

घड़े में भरे जातीय अहम को

पीने से खाली हुआ

अहम ब्रह्मास्मि वाला एक मास्टर

सहन नहीं कर पाया बच्चे की गुस्ताखी

वह टूट पड़ा मासूम पर

 

पूरी शक्ति लगा दी उसने

मासूम को सबक सिखाने में

मासूम जो कि असहाय,

अबोध और अशक्त ही नहीं था

अपितु मौजूदा तमाशबीनों में अकेला भी था,

बिलकुल अकेला

इसलिए एक-एक वार पर

वह चिल्लाता रहा पापा, पापा, पापा,

 

पापा जो कि उसका एक मात्र हीरो था

वह भी नहीं आ सका उसे बचाने

आता भी कैसे?

वह हाड़-माँस का बना पुतला ही तो था

तथाकथितों का अवतार थोड़े ही था

जो निकला आता

स्कूल की दीवारों

या पिलरों को तोड़कर

नरसिंह की तरह,

 

ऐसा भी कहीं होता है?

उस दिन भी नहीं हुआ!

कमरे के बाहर वालों ने तो क्या

कमरे के भीतर वालों ने भी

नहीं बचाया मासूम को

उस बर्बर,

जंगली और वहशी मास्टर से,

 

आँख, कान, पसली, ओंठ

सब तोड़ डाले उसने बच्चे के,

एक घड़े और दो घूट पानी से भी

कमतर आंका उसने बच्चे की जान को

तभी तो दो घूट पानी की कीमत

वसूल की उसने बच्चे की जान लेकर,

 

बच्चे की जान लेकर वह खुश हुआ

कि अब सुरक्षित हो गया उसका घड़ा

घड़े का पानी और जातीय अहम,

 

मगर उसे नहीं मालूम कि

एक दिन फिर उठेगा कोई बच्चा

शिद्दत की प्यास लिए,

इस बार वह घड़े से पानी नहीं पिएगा,

घड़े में जातीय अहम भरने वाले का लहू पिएगा

ताकि फिर कभी,

कोई न भर सके

किसी घड़े में जातीय अहम

कोई न ले सके

फिर किसी मासूम की जान

दो घूँट पानी और जातीय अहम के बदले ।

 

 

स्त्रोत : नवपल्लव बुक्स के लिए कवि द्वारा चयनित और भेजी गई कविताओं में एक कविता


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