कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: डॉ. अमित धर्मसिंह
ऐसा इसी देश में संभव है
कि रीढ़विहीन नपुंसक लोग
एक लड़की की रीढ़ तोड़ सकते हैं,
बोलने की तमीज़ न रखने वाले लोग
एक लाचार लड़की कि ज़ुबान काट सकते हैं,
सर उठाकर जीने की औकात न रखने वाले
एक बेबस लड़की की गर्दन तोड़ सकते हैं,
मानसिक रूप से विक्षिप्त नामर्द
जो ख़ुद कभी
कहीं न पहुँचे
और न पहुँच सकते हैं
वे लड़कियों के हाथ-पाँव तोड़ सकते हैं,
बावजूद इसके,
ऐसे धूर्त और क्रूर लोगों के लिए
थाने, कोर्ट, कचहरी, न्यायालय, संसद
सबके सब पनाहगार हो सकते हैं
समाज के ठेकेदार,
और देश के तथाकथित राष्ट्रभक्त
हो सकते हैं अपराधियों के पैरोकार
कि ऐसा इसी देश में संभव है ।
स्त्रोत : नवपल्लव बुक्स के लिए कवि द्वारा चयनित और भेजी गई कविताओं में एक कविता
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