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मृत्यु का इतिहासबोध

✍️ लेखन: डॉ. अमित धर्मसिंह

मुझमें न सिर्फ मेरी मृत्यु ज़िंदा रहती है,

और बहुत-सी मृत्युएँ ज़िंदा हैं मुझमें,

मुझमें ज़िंदा है उसकी मृत्यु

जो मोब लिंचिंग में मार दिया गया,

वह नन्हीं परी

जो बलात्कारियों का शिकार हो गई,

कठुआ की वह लड़की,

जिसको मरते-मरते भी

हवस का शिकार बनाया गया,

वह कैसे मर सकती है मुझमें?

 

ऑक्सीजन की कमी से मरने वाले बच्चे

जिस वक़्त एक-एक साँस के लिए छटपटा रहे थे

ठीक वह लम्हा अक्सर दम घोट रहा होता है मेरा,

चमकी बुखार से निस्तेज पड़े

बच्चों की खामोश चींखें

मेरे भीतर का शीशा

चटाक-चटाक तोड़ती रहती हैं दिन-रात,

 

वह महिला पत्रकार जिसको

गोलियों से भून दिया गया,

उसके बदन में धंसी एक-एक गोली

मेरी खोपड़ी के पार हुई जाती है बार बार,

 

फाँसी पर झूलते प्रेमी युगल,

जलाकर मार दी गई बहुएँ,

आत्महत्या करते किसान,

मुझमें हर समय ज़िंदा रहते हैं,

 

गोधरा गुजरात से लेकर

मुजफ्फरनगर, शब्बीरपुर तक मार दिए गए लोग

अभी तक कहाँ मरे हैं मुझमें!

 

इतिहास में हुईं ऐसी बेहिसाब हत्याएँ

जो आंकड़ों में दर्ज नहीं,

ऐसी हत्याएँ

जिन्हें हत्याएँ नहीं माना गया,

ऐसी हत्याएँ

जिनके हत्यारे कभी पकड़ में नहीं आए

और न कभी समझ में,

ऐसी हत्याएँ

जिनके हत्यारे पकड़ में होते हुए भी

कभी नहीं पकड़े गए,

ऐसी हत्याएँ

जिनमें मरने वाले को

आत्महत्या की हद तक

मजबूर किया गया मरने को,

ऐसी हत्याएँ

जिनमें मरने वालों को

मरने की हद तक जिंदा रखा गया,

ऐसी हत्याएँ,

जो एक लम्बी प्रक्रिया के तहत हुईं,

ऐसी हत्याएँ

जो एक झटके में कर दी गईं बेखौफ,

ऐसी हत्याएँ

जो विचारों, भावनाओं

और सपनों की शक्ल में हुईं,

ऐसी हत्याएँ

जिनमें भ्रूण की संभावनाओं को खत्म किया गया,

ऐसी हत्याएँ

जिन्हें धर्म या ईश्वर की

ओट लेकर अंजाम दिया गया साजिशन,

 

वे सब जिंदा हैं मुझमें,

मैं उनकी मौत के बारे में सोचकर मर रहा हूँ,

मैं यह सोचकर मर रहा हूँ

कि कैसे-कैसे मार दिए गए लोग,

कैसे-कैसे मारे जा रहे हैं लोग ।

 

 

स्त्रोत : नवपल्लव बुक्स के लिए कवि द्वारा चयनित और भेजी गई कविताओं में एक कविता


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