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चलता है वह

✍️ लेखन: डॉ. अमित धर्मसिंह

चलता है वह

सड़क की बायीं तरफ

सबको रास्ता देते हुए

जंगल में चलता है हवा की तरह,

पानी की तरह चलना आता है उसे,

औंस की घास पर चलता है सवेरे-सवेरे

यह जानने के लिए

कि काली अंधेरी रात

क्या सौंपकर जाती सुबह को,

 

चलता है वह

कि इस तरह नहीं

जैसे चलता है सूअर

गर्दन झुकाये या घुमाये बिना,

इस तरह भी नहीं

जैसे चलता है कोई

हाथ में डंडा और कुत्ता लिए हुए

इस तरह तो बिल्कुल नहीं चलता

जैसे चली थी एक अभिनेता की कार फुटपाथ पर,

 

चलता है वह

बढ़ती हुई मंहगाई या दंगों की तरह नहीं,

बढ़ते हुए बच्चों की तरह

साहूकार के ब्याज की तरह नहीं,

मां के घरेलू हिसाब की तरह

वक्त की हांफती हुई साँसों की तरह नहीं,

वक्त के सीने में धड़कती हुई

धड़कनों की तरह

चलता है वह ।

 

 

स्त्रोत : नवपल्लव बुक्स के लिए कवि द्वारा चयनित और भेजी गई कविताओं में एक कविता


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