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पीठ पर घर

✍️ लेखन: डॉ. अमित धर्मसिंह

घर ने माँ को पकड़ा था

या माँ ने घर को

या फिर दोनों ने एक-दूसरे को

कुछ कहा नहीं जा सकता

मगर दोनों को अलग होते हुए कभी नहीं देखा,

 

हर दूसरे दिन

खालीपन से बजबजाते कनस्तर,

एक-दो झिंगला खाट,

टूटी गुदड़ी और कुछ कन्ना तिड़के बर्तनों के अलावा

घर में ऐसा क्या था

जो माँ को हर समय घर से बाँधे रखता,

 

जिस गाँव पैदा हुई,

जिस गाँव बिहाई गयी,

उन दो गाँवों के अलावा

शायद ही माँ ने

भारत का दूसरा भूभाग देखा हो

और तो और

मायके से ससुराल

और ससुराल से मायके तक

अकेली न आ-जा सकती माँ,

 

गली-मोहल्ले में होने वाली शादी-विवाह में भी

बमुश्किल ही जा पाती

जाने के लिए कहा जाता

तो हमेशा यही कहती-

'तुम चले जाओ,

मैं घर पर हूँ,

घर भी तो कोई चाहिए ना,'

 

इस तरह ख़ुद घर पर रहती

और हमें

दावतों, मेलों और शादी-विवाहों में भेजती,

 

हमारे कई-कई दिन बाद लौटने पर भी

माँ और घर वहीं मिलते

जहाँ हम छोड़कर जाते,

न ज़रा-सा घर आगे बढ़ता

और न ज़रा-सी माँ,

 

एक के बाद एक

दो बेटों की शादी तक में भी

माँ को कहीं नहीं जाना पड़ा

मँढ़े से लेकर प्रीतिभोज तक

सबकुछ घर पर ही सम्पन्न हुआ

मगर तीसरे बेटे का रिसेप्शन

गाँव में नहीं,

शहर में दिया गया,

 

मजबूरन,

उस दिन माँ को घर छोड़कर

उसमें शामिल होना पड़ा

मगर जिस समय माँ पहुँची

खाना लगभग समाप्त हो चुका था,

अधिकांश लोग जा चुके थे,

डीजे के साथ थिरकने वाले भी थक चुके थे

फिर भी एक-दो महिलाओं ने

खींच लिया माँ को नाचने के लिए

 

घुटनों में असह्य दर्द होने के बावजूद ठुमकी माँ,

बमुश्किल पैर उठ रहे थे माँ के,

गर्दन तो क्षण भर भी नहीं उठी ऊपर

शायद उसकी पीठ पर

घर अब भी सवार था ।

 

 

स्त्रोत : नवपल्लव बुक्स के लिए कवि द्वारा चयनित और भेजी गई कविताओं में एक कविता


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